30 अक्टूबर को जागने वालों पर होगी मां लक्ष्मी की कृपा!

30 अक्टूबर को जागने वालों पर होगी मां लक्ष्मी की कृपा!

30 अक्टूबर को जागने वालों पर होगी मां लक्ष्मी की कृपा!

(ब्यूरो): आश्विन के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा शरदपूर्णिमा कहलाती हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त होकर अत्यंत तेजवान और ऊर्जावान होता है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है, जिससे आरोग्य की प्राप्ति सुलभ होती है। कई जगहों पर इस विशेष दिन में असाध्य रोगों के लिए औषधियों का वितरण किया जाता है।
व्रत में प्रदोष और शाम स्थित होने वाली पूर्णिमा ली जाती है आज हमें यह भ्रम रहता है की कौन सी तिथि हमें माननी चाहिए। इसके लिए जब भी शरद पूर्णिमा होगी तब निशीथ व्यापिनी तिथि ही हम लेंगे। यदि एक दिन पूर्व शाम को तिथि है तथा दूसरे दिन वह तिथि निशीथ अर्थात सायं काल में नहीं है तब हम एक दिन पूर्व की ही तिथि मानेंगे। इस बार आश्विन पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 30 अक्टूबर की शाम 5: 45 बजे से आरंभ होकर 31 अक्टूबर रात्रि 8:18 बजे तक रहेगी।
इसलिए एक दिन पूर्व ही निशीथ व्यापनी तिथि होने से शरद पूर्णिमा 30 अक्टूबर को मनाई जाएगी। उन्होंने बताया कि चंद्रमा मन का कारक होता है और मन से ही हमें संपूर्ण कार्य करने की प्रेरणा होती प्राप्त है। ऋग्वेद के श्रीसूक्त के अनुसार भी सभी कामनाओं की पूर्ति का कारक मन को माना गया है।इस दिन कोजागर व्रत का विधान भी कहा गया है कहते है इस दिन महालक्ष्मी रात्रिकाल में भ्रमण कर यह देखती है कि कौन जाग रहा है और कौन नहीं तथा जो जागता है उसे धन देती है और लक्ष्मी जी को को जागर्ती कहने के कारण इस व्रत को कोजागर व्रत कहा जाने लगा।शरद पूर्णिमा पर भगवती लक्ष्मी पूजन का विधान है। नारद पुराण के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर निशीथ काल में माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और माता यह भी देखती हैं कि कौन जाग रहा है। यहां जागने के दो अर्थ हैं। पहला, जो लोग इस रात में जागकर मां लक्ष्मी की उपासना करते हैं और दूसरा, जो अपने कर्मों को लेकर सचेत हैं। दोनों को मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिष के अनुसार जो भक्त इस रात को लक्ष्मी जी की षोडशोपचार विधि से पूजा करके श्री सूक्त का पाठ, कनकधारा स्त्रोत, विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करते हैं, उन्हें मां लक्ष्मी की असीम कृपा प्राप्त होती है। फिर चाहें उनकी कुंडली में धन के कोई विशेष योग न भी हों।
शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की परंपरा है। दरअसल, इसमें मिलाए जाने वाले दूध, शक्कर और चावल का कारक भी चंद्रमा है। रातभर खीर पर जब चंद्रमा की किरणों का स्पर्श होता हैं, तो यही खीर चंद्रमा की अमृतमयी किरणों से औषधीय गुणों से युक्त हो जाती है। इसे प्रसाद रूप में कई देवस्थानों में भी वितरित किया जाता है, ताकि इसका सेवन करने वाले निरोगी और कांतिवान रहें। खीर पित्तशामक होती है, जो इस ऋतु में कई रोगों से बचाती है। इसीलिए महालय से लेकर दीपावली तक खीर को विशेष रूप से शामिल किया जाता है।
वहीं, शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा को देखने से या सुई में धागा पिरोने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। एक घंटे तक शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी में रहने से शरीर निरोग रहता है और कांति बढ़ती है।

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