कोरोना ने बदल दिया देश, अब आप भी बदलिए !

कोरोना ने बदल दिया देश, अब आप भी बदलिए !


मदन गुप्ता सपाटू का व्यंग्य चंडीगढ़
(मदन गुप्ता सपाटू,  ज्योतिषाचार्य)
। कल बाबू रामलाल, नाक पर नीला अंगोछा लटकाए,गले में गोल्ड मेडल टांगे, हाथ में रंग बिरंगा सटीफिकेट [ उनकीभाषा में] थामे, शालओढ़े , सम्मान समारोहसे डायरेक्ट हमारे दरवज्जे ,अपनीवीर गाथा सुनाने लैंड कर गए और मारे खुशी के नॉन स्टॅाप चालू हो गए,‘ भईया ! आजतक किसी ने हमें घास तक नहींडाली, भला हो कोरोनाका, हमें कईसंस्थाओं ने ‘ कोरोनावॉरियर ‘ की उपाधि सेसम्मानित होने का निमंत्रण दिया है। यही नहीं कई समाज सेवी संस्थाएं , ऑन लाइन सम्मानित करने वाली हैं।’हमारा माथा ठनका कि जो शख़्स चार महीने से लॉकडाउन के दौरान , घरमें दुबका बैठा रहा, कभीअठन्नी तक नहीं खर्ची, व्हॉट्सएप पर बेकार सी डिश दिखा दिखा कर टाइम पास करता रहा, जब मजदूर नंगे पैर जलती सड़कों पर अपने गांवों को दौड़ रहे थे,उस वक्त जिसके घर का माहौल ऐसा था मानो कह रहा हो- कारवां गुज़र गयाटीवी देखते रहे , जो  कोरोना कैरियर तक नहीं था,
आज कोरोना वारियर कैसे हो गया ?
फिर समझ आया कि कुछ लोगों का धंधा ही सम्मानितकरना है चाहे वह साहित्य का क्षेत्र हो या समाज सेवा का। ऐसे लोग कभी बेरोजगारनहीं रहते। लॉक डाउन में दूसरों के पैसों से लंगर, छबीलें लगा कर, मास्कसैनेटाइजर बांट कर  , अखबारों में फोटो छपवा कर, सोशल मीडिया में वाहवाही लूट कर

अनलॉकहोते ही सोचने लगे कि अब क्या किया जाए ? 

वेरी सिंपल!सर्टीफिकेट छपवाओ, 50रुपये वाले गोल्ड मेडल होलसेल में खरीदो, 125 रुपये की शाल आ जाती है, सोशल आर्गनाइजेशन के नाम पर सस्ते में हॉल बुक करवाओ और मामला फिट।बहुत से लोग तो खुद ब खुद ये आयटम्ज साथ लेकर ही चलते हैं। न जाने किस मोड़ परसम्मानित करने वाले मिल जाएं ! एडीशनल खर्चा भी बच जाता है …सो अलग।

मीडिया कवरेज….नो प्रॉब्लम ! सम्मान करने वाले भीखुश और होने वाले भी ’ फीलऑब्लाईज्ड’।आम के आम गुठलियों के दाम।एक सज्जन तो सम्मान समारोहों में इतने बिजी हैंकि कई हफ्तों से घर में खाना ही नहीं खाया। सुबह सम्मानित , शाम सम्मानित। चाय पानी , लंगर मुफ्त। जिन्होंने डक्का तक नहींतोड़ा उनके घर  कोरोना वॉरियर के प्रमाणपत्रों, शाल दुशालों सेसुसज्जित हैं। जो रात दिन सेवा करते रहे, वे मुंह ताक रहे हैं। एक सज्जन ने तो कोरोना सेवा भाव के लिए खुद हीअखबार में पदम श्री प्रदान करने की सिफारिश तक कर दी है। जमाना सेवा भाव का कम, ईवेंट मैनेजमेंट का अधिक है। जो न सीखेवो अनाड़ी है।हमने क्या क्या न किया कोरोना तेरे लिए ? ताली बजाई । थाली  बजा बजा कर तुड़वाई। मोमबत्ती और दियों का खर्चाउठाया। चार महीने घर में बर्तन घिसे झाड़ू पोचे किए। और अनलॉक पीरियड में बीवी नेइसे परमानेंट डयूटी में ही शामिल कर दिया। कोविडों का फोन पर हालचाल पूछते रहे। औरअब हमें पूछने वाले नदारद हैं !अब ये तो वही बात हो गई कि घोड़े को न मिले घास, गधे खाएं च्यवनप्राश। लंगूर ले भागेहूर।

अच्छे समार्ट लोग बॉलीवुड और राजनीति में जीवनसाथी की तलाश में ताकते झांकतेऔर बुढ़ा जाएं और लूले लंगड़े घोड़ी चढ़ जाएं। फरस्ट्र्ेशन तो बनती है न ! और हमाराकोरोना अवार्ड भी तो बनता ही है। अवार्ड सेरेमनी का खर्चा-पत्ता भी हम खुदे हीउठाय लेंगे। फंक्शन का सामान और सम्मान भी उठा ले आएंगे। फोटूग्राफर और  वीडियो वाला भी हमीं संभाल लेंगे। बस आप हमेंएक मौका सम्मानित होने का जरुर दीजेै।कोरोना कब जाएगा ये तो चीन को भी नहीं पतापरंतु कोरोना  कैरियर्ज से ज्यादा कोरोनावारियर्ज की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। वह दिन दूर नहीं जब 15 अगस्त या26 जनवरी को पदम श्री की तरह कोरोना श्री जैसे अलंकरणों से ऐसे लोगों की लंबी लाईनको सम्मानित किया जाएगा!
व्यंग्य

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *