मजदूर हूँ, मजबूर हूँ : लाचार पिता ने दिव्यांग बेटे को 1150 किमी ले जाने के लिए चुराई साइकिल,चिट्ठी लिख मांगी माफ़ी

मजदूर हूँ, मजबूर हूँ : लाचार  पिता ने दिव्यांग बेटे को 1150 किमी ले जाने के लिए चुराई साइकिल,चिट्ठी लिख मांगी माफ़ी

भरतपुर : (ब्यूरो)  एक बेबस और मजलूम पिता की मजबूरी कैसे ईमान को डिगा देती है…कैसे उसे कसूरवार बना देती है…इसे बरेली के मोहम्मद इकबाल की इस चिट्ठी से महसूस किया जा सकता है। इकबाल का कसूर इतना है कि उसने दिव्यांग बेटे को 1150 किमी दूर ले जाने के लिए साइकिल चुरा ली…लेकिन दूसरी तरफ साइकिल मालिक के नाम चिट्ठी भी लिखी, जिसमें लिखा कि मैं आपका कसूरवार हूं, लेकिन मजदूर हूं और मजबूर भी। मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना…


रारह गांव के सहनावली में रहने वाली साइकिल मालिक साहब सिंह को बरामदे से साइकिल गायब होने का पता चला। सफाई के वक्त कागज का छोटा सा टुकड़ा मिला, जिस पर इकबाल ने अपना दर्द लिखा था। साहब सिंह बताते हैं- “इकबाल की चिट्ठी से आंखें भर आईं। साइकिल चोरी हो जाने का जो आक्रोश और चिंता थी, वह अब संतोष में बदल गई है। मेरे मन में इकबाल के प्रति कोई द्वेष नहीं है, बल्कि यह साइकिल सही मायने में किसी के दर्द के दरिया को पार करने में काम आ रही है। इकबाल ने बेबसी में यह दुस्साहस किया, जबकि बरामदे में और भी कई कीमती चीजें पड़ी थीं, लेकिन उन्हें हाथ नहीं लगाया।’
मोहम्मद इकबाल कहां से आया था..क्या करता था…कौन साथ था…बरेली में कहां जाना था…इसका कोई पता नहीं चल सका। लेकिन वह हजारों मजदूरों में से एक हैं, जो रोजी-रोजी छिनने के बाद इन दिनों अपने गांव, शहर में अपने घर पहुंचने की जद्दोजहद में हैं।

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